57 वी श्री राम जानकी कथा के चौथे दिन की कथा में  प्रभु श्री राम के बाल्यकाल से ताड़का वध का दिव्य प्रसंग सुनाया गया ।

धार्मिक हरिद्वार

सनातन ज्ञानपीठ शिव मंदिर सेक्टर 1  भेल रानीपुर हरिद्वार प्रांगण मे लगातार चली आ रही 57 वी श्री राम जानकी कथा के चौथे दिवस कथा में परम पूज्य आचार्य महंत प्रदीप गोस्वामी महाराज जी ने प्रभु श्री राम के बाल्यकाल,उनकी शिक्षा और विश्वमित्र के साथ श्रीराम,लक्ष्मण का वन मे जाने और ताड़का वध का दिव्य प्रसंग सुनाया ।कथा व्यास जी ने कथा को आगे सुनाते हुए बताया की दसरथ के चारो पुत्रो का नामकरण महर्षि वशिष्ठ ने उनके गुणों के आधार पर किया।जैसे राम- जिसका नाम जपने से सरा संसार शांति पाता है,लक्ष्मण-जो शुभ लक्षणों के भंडार है,भरत-जो विश्व का पालन करने की शक्ति रखते है और शत्रुघ्न- जो शत्रुओं का विनाश करने वाले है ।कथा व्यास जी बताते है बालक श्री राम बहुत ही शांत और तेजस्वी स्वभाव के थे। वे आंगन में घुटनों के बल चलते, तो उनके पैरों के पैंजनिया (पायल) की मधुर ध्वनि सुनकर राजा दशरथ मंत्रमुग्ध हो जाते थे।बचपन से ही चारों भाइयों में अगाध प्रेम था।लक्ष्मण जी सदा राम जी की छाया बनकर रहते थे,और शत्रुघ्न जी भरत जी के साथ रहते थे।श्री राम जी खेल-खेल में भी अपने भाइयों को जीता देते थे और स्वयं हार जाते थे ताकि उनके भाइयों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे। यह उनके त्यागपूर्ण व्यक्तित्व की पहचान थी।जब चारों भाई थोड़े बड़े हुए,तो उन्हें गुरु वशिष्ठ के शिक्षा ग्रहण करने आश्रम भेजा गया। भगवान होकर भी उन्होंने एक साधारण शिष्य की तरह गुरु की सेवा की।वेदों,पुराणों, और उपनिषदों का ज्ञान उन्होंने बहुत ही अल्प समय में प्राप्त कर लिया।
शस्त्र विद्या (धनुष विद्या) में वे इतने निपुण हुए कि उनका निशाना अचूक था। वे प्रातः काल उठकर सबसे पहले अपने माता-पिता और गुरु के चरण स्पर्श करते थे,जो आज भी समाज के लिए एक महान सीख है।बचपन समाप्त होते-होते महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और उन्होंने राजा दशरथ से असुरों के वध के लिए राम और लक्ष्मण को मांगा।
राजा दशरथ अत्यंत दुखी हो गए। उन्होंने कहा कि “मेरे राम अभी बहुत छोटे हैं, वे राक्षसों से कैसे लड़ेंगे? आप मेरी पूरी सेना ले जाएँ या मुझे साथ ले चलें।”तब कुलगुरु वशिष्ठ जी ने राजा दशरथ को समझाया कि विश्वामित्र कोई साधारण ऋषि नहीं हैं और राम जी के साथ जाने में ही सबका कल्याण है। गुरु की आज्ञा मानकर दशरथ जी ने भारी मन से लोक कल्याण के लिए अपने पुत्रों को विदा किया।वन पहुंच कर उत्पाती राक्षसो का संहार कर वन को भयमुक्त करा।कथा व्यास जी ने कहा की आज की कथा ये सीख देती है की महान कार्यों और लोक कल्याण हित के लिए सुख -सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है।
कथा मे मंदिर सचिव ब्रिजेश कुमार शर्मा और मुख्य यजमान जे.पी. अग्रवाल,मंजू अग्रवाल,पुलकित अग्रवाल,सुरभि अग्रवाल,दिलीप गुप्ता हरिनारायण त्रिपाठी,तेज प्रकाश, अनिल चौहान,मानदाता,राकेश मालवीय,रामकुमार,मोहित तिवारी, आदित्य गहलोत,ऋषि,सुनील चौहान,होशियार,जय प्रकाश,राजेंद्र प्रसाद दिनेश उपाध्याय,रामललित गुप्ता,रजनीश,अर्जुनचौहान,आर.सी.अग्रवाल,अलका शर्मा,संतोष चौहान,पुष्पा गुप्ता,नीतू गुप्ता,अंजू पंत,अनपूर्णा,सुमन,विभा गौतम,बृजेलेश,दीपिका,कौशल्या,
सरला शर्मा,राजकिशोरी मिश्रा,मनसा मिश्रा,सुनीता चौहान,बबिता,मीनाक्षी
और अनेको श्रोता गण कथा के दौरान सम्मिलित रहे।

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