गोस्वामी तुलसी दास जी की जन्मतिथि पर श्री राम नाम विश्व बैंक समिति द्वारा पुण्य स्मरण करते हुए उनके मूल्यों को आत्मसात करने का आव्हान किया गया।

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रामभक्ति और लोकमंगल के अमर साधक थे गोस्वामी जी : सुमित तिवारी
“श्रीरामचरितमानस” के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी भारतीय संस्कृति, भक्ति साहित्य और लोकजीवन के ऐसे महान संत-कवि थे, जिनकी वाणी ने भगवान श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी जयंती केवल एक महान साहित्यकार को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों, मर्यादा, करुणा और सदाचार को आत्मसात करने का दिन भी है।

श्री राम नाम विश्व बैंक समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित सुमित तिवारी ने बताया कि तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भक्ति को केवल मंदिरों और विद्वानों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आम जनमानस की भाषा में घर-घर पहुँचा दिया। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘रामचरितमानस’ ने भगवान श्रीराम के चरित्र को लोकभाषा में प्रस्तुत करते हुए भारतीय समाज को धर्म, कर्तव्य, त्याग, सेवा और मर्यादा का संदेश दिया।

भगवान श्रीराम को तुलसीदास जी ने केवल एक आराध्य देव के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श मित्र और आदर्श राजा के रूप में चित्रित किया। श्रीराम का जीवन उनके लिए सत्य, न्याय, करुणा और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा है।

श्री तिवारी ने बताया कि तुलसीदास जी की लेखनी में भक्ति के साथ-साथ लोकमंगल की भावना भी दिखाई देती है। उन्होंने समाज को प्रेम, विनम्रता, परोपकार और सदाचार का संदेश दिया। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—

“परहित सरिस धरम नहि भाई,
पर पीड़ा सम नहि अधमाई।”

आज भी मानवता के लिए उतनी ही प्रासंगिक है। इसका संदेश स्पष्ट है कि दूसरों का हित करने से बड़ा कोई धर्म नहीं और किसी को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं।

संस्था के महासचिव विकास गर्ग ने कहा कि तुलसीदास जी का साहित्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। ‘विनय पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘दोहावली’ और ‘हनुमान चालीसा’ जैसी रचनाएँ आज भी करोड़ों लोगों के जीवन में श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत हैं।

आज जब समाज तेजी से बदल रहा है और मानवीय मूल्यों के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं, तब तुलसीदास जी की शिक्षाएँ और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उनका साहित्य हमें याद दिलाता है कि विकास और आधुनिकता के साथ संस्कार, करुणा, सत्य, सेवा और नैतिकता को बनाए रखना भी आवश्यक है।

महंत शुभम गिरी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर हमें केवल उनके चित्र पर पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेना चाहिए। यदि हम उनके बताए मार्ग पर चलते हुए परोपकार, सत्य, मर्यादा और मानव सेवा को अपनाएँ, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

तुलसीदास जी अमर हैं, क्योंकि उनकी वाणी में राम हैं, उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति है और उनके संदेश में सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की भावना है।

इस अवसर पर दक्ष पंवार, मुकेश शर्मा, पिंटू, मिलनभाई पांड्या, आशु बड़थ्वाल, बुद्धि बल्लभ, शरद चंद्र घोलकर, इशिका धीमान, विशाल मालिक, रजनी मालिक, अंकित शर्मा, कुलदीप अरोड़ा, कुलदीप राय, राजकुमार, आचार्य संदीप, आचार्य संतोष आदि लोग उपस्थित रहे।

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