डीपीएस स्कूल रानीपुर बीएचईएल हरिद्वार की कक्षा 10 की छात्रा काव्या सहगल ने अपने भावपूर्ण लेख “सड़क : जीवन के सफ़र की मूक साक्षी” के माध्यम से सड़क को केवल एक मार्ग नहीं, बल्कि जीवन के अनगिनत पलों की साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया है।
काव्या ने अपने लेख में सड़क को एक ऐसी मूक साक्षी बताया है, जो हर दिन लोगों की खुशियां, संघर्ष, हंसी और भावनाओं को अपने भीतर समेटे रहती है।
लेख का संदेश यह है कि सड़क केवल मंज़िल तक पहुंचने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के सफ़र और उससे जुड़ी यादों का प्रतीक है। काव्या की रचनात्मक अभिव्यक्ति और संवेदनशील सोच की पाठकों द्वारा सराहना की जा रही है। देखें इस लेख क्या लिखा है
सड़क- आम भाषा में तो यह वह पक्का रास्ता है जो वाहनों के चलने के लिए बनाया जाता है, जिस पर तारकोल और गिट्टी की परत बिछी होती है। परंतु यदि इसे गहराई से समझा जाए, तो इस शब्द को एक निश्चित परिभाषा देना संभव नहीं है।
सुबह जब काली सड़क पर स्कूल जाते नन्हे बच्चों की पीली बस गुजरती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो एक छोटी सी मधुमक्खी अपने घोंसले से उड़ान भर मीठा रस लेने जा रही हो।
उसके बाद जब सभी माता-पिता अपने बच्चों को विदा कर अपने-अपने काम पर निकलते हैं, तो सड़क जीवन की चहल-पहल से भर उठती है।
सुबह यह सड़क कुछ ताज़ी और प्रसन्न प्रतीत होती है, क्योंकि इस पर से गुजरने वाली नन्हे बच्चों की बसें और उनमें गूंजती खिलखिलाहट इसमें जैसे प्राण भर देती हैं। फिर बड़े लोग अपने-अपने दफ्तर के लिए रवाना होते हैं—कोई हड़बड़ी में, तो कोई आराम से गाने सुनते हुए। वहीं घर के बुजुर्ग इन सब दृश्यों को निहारते हुए अपनी सुबह की सैर पूरी करते हैं।
दोपहर को यही सड़क कुछ थकी-थकी सी लगती है, जब बच्चे पसीने से तर-बतर घर पहुंचते हैं और स्कूल से घर तक के लंबे सफर के बाद विश्राम करना चाहते हैं।
शाम को जब पिताजी ऑफिस से लौटते हुए समोसे या कचौरी लेकर आते हैं, तो वही बच्चे अपनी थकान भूलकर सड़क पर नज़रें टिकाए रखते हैं कि कब गाड़ी आए और कब वे अपने पिता को गले लगा सकें।
यह तो सड़क की दिनचर्या हुई, पर इसके कई और भी पहलू हैं। जब कभी मैं सड़क किनारे एक बेंच पर बैठकर उससे बातें करती हूँ, तो वह मुझे अपने रोज़ देखे हुए अनगिनत किस्से सुनाती है। कुछ किस्से दर्दनाक होते हैं, परंतु अधिकतर मन के किसी कोने में छिपी यादों को ताज़ा कर देते हैं।
कभी वह उन छोटे बच्चों का दृश्य दिखाती है, जो बाइक पर अपने पिता के पीछे बैठकर उड़ने जैसा अनुभव करते हैं।
कई बार तो सड़क पर चलने वाले लोग, जिन्हें हम इस कहानी का मुख्य पात्र मानते हैं, अपने आप में ही एक हास्यप्रद कवि सम्मेलन रचते प्रतीत होते हैं।
सभी वाहन अपने-अपने अंदाज़ में जैसे पंक्तियाँ कहते हैं।
एक बाइक वाला साइकिल वाले के सामने ऐंठता है, तभी एक लंबी-चौड़ी गाड़ी वाला उसे चुनौती देता हुआ आगे निकल जाता है।
इन सबके बीच यह सड़क चुपचाप सब कुछ देखती, सुनती और अपने भीतर समेटती रहती है।
शायद सड़क केवल एक रास्ता नहीं,
बल्कि जीवन के अनगिनत पलों की मूक साक्षी है।
यह हर हंसी, हर आह, हर मिलन और हर बिछड़न को संजोए रखती है,
और हमें सिखाती है कि सफर ही असली कहानी है, मंज़िल तो बस एक पड़ाव है|

