बनवास का प्रसंग श्रीराम की मर्यादा,त्याग,कर्तव्य,धैर्य, पितृ-भक्ति और संतों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है- आचार्य प्रदीप गोस्वामी महाराज।

धार्मिक हरिद्वार

सनातन ज्ञानपीठ शिव मंदिर सेक्टर 1 भेल रानीपुर हरिद्वार प्रांगण में लगातार चली आ रही 57 वीं श्री राम जानकी कथा के सातवें दिवस की कथा में परम पूज्य आचार्य महंत प्रदीप गोस्वामी महाराज जी ने राम तिलक,राम वनवास,श्री राम केवट मिलन और भारद्वाज मुनि के मिलन की कथा सुनाई।कथा व्यास जी बताया की जब राजा दशरथ वृद्ध हो चले तब उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के सद्गुणों और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें अयोध्या का युवराज बनाने का निर्णय लिया।पूरे नगर में उत्सव का माहौल था,गलियों को सजाया गया था और प्रजा अपने प्रिय राजकुमार के राजतिलक की प्रतीक्षा कर रही थी।तब अयोध्या के राजा दशरथ ने श्री राम के राज्याभिषेक (राम तिलक) की घोषणा की,तो पूरी अयोध्या उत्सव में डूब गई।किंतु दासी मंथरा की बातों में आकर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने पुराने दो वरदान मांग लिए।जो राजा दशरथ ने कई वर्षों पहले देवासुर संग्राम के दौरान दिए थे।पहले वरदान में उन्होंने भरत का राजतिलक और दूसरे में राम को 14 वर्ष का वनवास मांगा।पिता की आज्ञा को शिरोधार्य मानकर पितृ -वचन को निभाने के लिए श्री राम ने सहर्ष राजसी वस्त्र त्याग दिए और सीता माता एवं लक्ष्मण जी के साथ वन की ओर प्रस्थान किया।उनके पीछे पूरी अयोध्या नगरी रोती-बिलखती चल पड़ी। जिन्हें समझा -बुझाकर श्री राम ने वापस भेजा।इस त्याग ने श्री राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बना दिया तभी तो श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये।सबसे पहले वे तमसा नदी के तट पर पहुंचे और वहां से आगे बढ़ते हुए श्रृंगवेरपुर पहुंचे।यहाँ उनकी भेंट उनके प्रिय मित्र और निषादराज गुह से हुई। गुह ने उनकी सेवा की और अगले दिन केवट ने अपनी नाव से तीनों को पवित्र गंगा नदी के पार उतारा।गंगा पार करने के बाद, श्री राम ने प्रयाग की ओर प्रस्थान किया।गंगा और यमुना के पावन संगम, प्रयाग पहुँचने पर श्री राम महर्षि भारद्वाज के आश्रम गए।महर्षि भारद्वाज एक महान ज्ञानी और तपस्वी थे। उन्होंने श्री राम का भव्य स्वागत किया और उन्हें पहचान लिया कि वे साक्षात् विष्णु के अवतार हैं।श्री राम ने अत्यंत विनम्रता के साथ मुनि से पूछा कि उन्हें वनवास की अवधि बिताने के लिए किस स्थान पर निवास करना चाहिए।महर्षि भारद्वाज ने उन्हें चित्रकूट पर्वत पर जाने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि चित्रकूट एक अत्यंत पवित्र और शांत स्थान है, जहाँ कई ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं और वहां का वातावरण वनवास के लिए सर्वश्रेष्ठ है।ऋषि की आज्ञा लेकर और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर, श्री राम यमुना नदी पार कर चित्रकूट की ओर चल दिये ओर वही पर कुटिया बना कर रहने लगे। कथा व्यास जी बताते है कि आज का प्रसंग श्रीराम की मर्यादा,त्याग,कर्तव्य,धैर्य, पितृ-भक्ति और संतों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है।
कथा मे मंदिर सचिव ब्रिजेश कुमार शर्मा और मुख्य यजमान जे.पी. अग्रवाल,मंजू अग्रवाल,पुलकित अग्रवाल,सुरभि अग्रवाल,दिलीप गुप्ता हरिनारायण त्रिपाठी,तेज प्रकाश, अनिल चौहान,मानदाता,राकेश मालवीय,रामकुमार,मोहित तिवारी, आदित्य गहलोत,ऋषि,सुनील चौहान,होशियार,जय प्रकाश,राजेंद्र प्रसाद,दिनेश उपाध्याय,रामललित गुप्ता,अवधेश पाल,शरद रजनीश,अर्जुनचौहान,आर.सी.अग्रवाल, शिवप्रकाश,मधुसूदन चौहान अलका शर्मा,संतोष चौहान,पुष्पा गुप्ता,नीतू गुप्ता,अंजू पंत,सुमन, अनपूर्णा,विभा गौतम,बृजेलेश,
दीपिका,कौशल्या,सरला शर्मा,
राजकिशोरी मिश्रा,मनसा मिश्रा, सुनीता चौहान,बबिता,मीनाक्षी
और अनेको श्रोता गण कथा के दौरान सम्मिलित रहे।

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